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Showing posts from August, 2016

पोळा उत्सव ,काली मारबत,पीली मारबत.

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महाराष्ट्रीयन समाज में पिठोरी अमावस्या पर पोला ( पोळा ) पर्व धूमधाम से मनाया गया। यह छत्तीसगढ़ का लोक पर्व भी है। इस दिन अपने पुत्रों की दीर्घायु के लिए चौसष्ठ योगिनी और पशु धन का पूजन किया जाता है। Read more »

गणेश चतुर्थी ,पत्थर चौथ,कलंक चौथ ,विनायक चतुर्थी

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ऊँ वक्रतुण्ड़ महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरू मे देव , सर्व कार्येषु सर्वदा।। श्रीगणेश चतुर्थी को पत्थर चौथ और कलंक चौथ, विनायक चतुर्थी के नाम भी जाना जाता है। यह शुभ पर्व प्रति वर्ष भाद्रपद मास को शुक्ल चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। Read more »

कान्हा, आ जाओ (कहानी)

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एक पंडित था , वो रोज घर घर जाके भगवत गीता का पाठ करता था | एक दिन उसे एक चोर ने पकड़ लिया और उसे कहा तेरे पास जो कुछ भी है मुझे दे दो , तब वो पंडित जी बोला की बेटा मेरे पास कुछ भी नहीं है , तुम एक काम करना मैं यहीं पड़ोस के घर मैं जाके भगवत गीता का पाठ करता हूँ , Read more »

आदित्य हृदयम मंत्र,स्रोत्र

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ततो युद्धपरिश्रान्तम् समरे चिन्तया स्थितम । रावणम् चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम ॥ 1 दैवतैश्च समागम्य दृष्टुमभ्यागतो रणम । उपागम्या ब्रवीद्राम - मगस्तयो भगवान् ऋषिः ॥ 2 1,2 उधर श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिंता करते हुए रणभूमि में खड़े हुए थे । इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया । यह देख भगवान् अगस्त्य मुनि , जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे , श्रीराम के पास जाकर बोले । Read more »

कृष्ण की सीख (कृष्ण लीला)

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महाभारत काल की बात है। एक बार कृष्ण और बलराम किसी जंगल से गुजर रहे थे। चलते - चलते काफी समय बीत गया और अब सूरज भी लगभग डूबने वाला था। अँधेरे में आगे बढना संभव नहीं था , इसलिए कृष्ण बोले , “ बलराम , हम ऐसा करते हैं कि अब सुबह होने तक यहीं ठहर जाते हैं , भोर होते ही हम अपने गंतव्य की और बढ़ चलेंगे। ” Read more »

सूरदास के पद (कृष्ण भक्ति )

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जसोदा हरि पालनैं झुलावै। हलरावै , दुलराइ मल्हावै , जोइ - जोइ कछु गावै॥ मेरे लाल कौं आउ निंदरिया , काहैं न आनि सुवावै। तू काहैं नहिं बेगहिं आवै , तोकौं कान्ह बुलावै॥ कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं , कबहुँ अधर फरकावै। सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि , करि - करि सैन बतावै॥ इहिं अंतर अकुलाइ उठे हरि , जसुमति मधुरैं गावै। जो सुख सूर अमर - मुनि दुरलभ , सो नँद - भामिनि पावै॥ भावार्थ : श्रीयशोदा जी श्याम को पलने में झुला रही हैं। कभी झुलाती हैं , कभी प्यार करके पुचकारती हैं और चाहे जो कुछ गाती जा रही हैं। ( वे गाते हुए कहती हैं -) निद्रा ! तू मेरे लाल के पास आ ! तू क्यों आकर इसे सुलाती नहीं है। तू झटपट क्यों नहीं आती ? तुझे कन्हाई बुला रहा है। ' श्यामसुन्दर कभी पलकें बंद कर लेते हैं , कभी अधर फड़काने लगते हैं। उन्हें सोते समझकर माता चुप हो रहती हैं और ( दूसरी गोपियों को भी ) संकेत करके समझाती हैं ( कि यह सो रहा है , तुम सब भी चुप रहो ) । इसी बीच में श्याम आकुल होकर ...